15 अगस्त पर जानिए झारखंड के भगवान बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू, नीलाम्बर-पीताम्बर, बुधु भगत और अन्य वीर स्वतंत्रता सेनानियों की संघर्षगाथा।
रांची: देश 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाता है। इस दिन तिरंगा फहराने के साथ उन वीरों को भी याद किया जाता है, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया और देश की आजादी की नींव मजबूत की। झारखंड की धरती भी ऐसे वीर स्वतंत्रता सेनानियों और जननायकों की संघर्षगाथाओं से समृद्ध रही है। राज्य सरकार के अनुसार, यहां के लोगों ने देश की आजादी से पहले ही जल, जंगल और जमीन के अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू कर दिया था।
झारखंड के स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी केवल एक आंदोलन तक सीमित नहीं है। अलग-अलग समय में यहां कोल विद्रोह, संथाल हूल, 1857 का विद्रोह और बिरसा मुंडा का उलगुलान जैसे संघर्ष हुए। इन आंदोलनों में आदिवासी और स्थानीय समुदायों ने ब्रिटिश शासन, शोषण और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई।
भगवान बिरसा मुंडा: उलगुलान के महानायक
झारखंड के सबसे प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानियों में भगवान बिरसा मुंडा का नाम सबसे ऊपर आता है। उनका जन्म 15 नवंबर 1875 को खूंटी जिले के उलीहातू में हुआ था। उन्होंने आदिवासी समाज को संगठित करते हुए ब्रिटिश शासन और जमीन-जंगल से जुड़े शोषण के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया।
बिरसा मुंडा का संघर्ष इतना प्रभावशाली रहा कि आज उन्हें झारखंड के प्रमुख जननायकों में गिना जाता है। रांची में उनके नाम पर स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय भी स्थापित किया गया है, जहां झारखंड के कई जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाओं को प्रदर्शित किया गया है।
सिदो-कान्हू ने फूंका हूल का बिगुल
सिदो और कान्हू मुर्मू झारखंड के संथाल हूल के प्रमुख नायकों में शामिल थे। 1855 में भोगनाडीह से ब्रिटिश शासन, शोषण और अन्याय के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंका गया। झारखंड सरकार भी सिदो-कान्हू को जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले महानायकों के रूप में याद करती है।
नीलाम्बर-पीताम्बर और 1857 की क्रांति
झारखंड में 1857 के विद्रोह की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। नीलाम्बर-पीताम्बर जैसे वीरों ने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ संघर्ष किया। चतरा में 2 अक्टूबर 1857 को अंग्रेजों और विद्रोहियों के बीच महत्वपूर्ण युद्ध हुआ था। झारखंड पर्यटन विभाग के अनुसार, इस लड़ाई में बड़ी संख्या में क्रांतिकारी मारे गए थे।
बुधु भगत से लेकर टाना भगत तक
झारखंड की स्वतंत्रता और जनसंघर्ष की गाथा में वीर बुधु भगत, तेलंगा खड़िया, पोटो हो, गंगा नारायण सिंह और टाना भगत आंदोलन से जुड़े लोगों का भी महत्वपूर्ण स्थान है। रांची के स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय में ऐसे कई जननायकों की प्रतिमाएं और उनकी संघर्षगाथाएं प्रदर्शित की गई हैं।
15 अगस्त पर याद करने का दिन
स्वतंत्रता दिवस केवल आजादी का जश्न मनाने का अवसर नहीं, बल्कि उन लोगों को याद करने का दिन भी है जिन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। झारखंड की इन वीरगाथाओं से आने वाली पीढ़ियों को साहस, स्वाभिमान और अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की प्रेरणा मिलती है।
झारखंड के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और आंदोलन
| स्वतंत्रता सेनानी/नायक | प्रमुख संघर्ष/पहचान | प्रमुख क्षेत्र |
|---|---|---|
| बिरसा मुंडा | उलगुलान | छोटानागपुर |
| सिदो-कान्हू | संथाल हूल | संथाल परगना |
| नीलाम्बर-पीताम्बर | 1857 का विद्रोह | पलामू क्षेत्र |
| बुधु भगत | ब्रिटिश विरोधी संघर्ष | छोटानागपुर |
| तेलंगा खड़िया | जनजातीय प्रतिरोध | गुमला क्षेत्र |
| पोटो हो | ब्रिटिश विरोधी आंदोलन | कोल्हान |



