झारखंड वन विभाग में अधिकारियों और फील्ड कर्मियों के कई पद लंबे समय से खाली हैं। रांची में ACF, RFO और फॉरेस्टर के 33 पद रिक्त हैं।
रांची, 24 सितंबर: झारखंड की पहचान उसके घने जंगलों और समृद्ध वन संपदा से है, लेकिन इन जंगलों की निगरानी और संरक्षण की जिम्मेदारी संभाल रहा वन विभाग मानव संसाधन की कमी से जूझ रहा है। अधिकारियों से लेकर फील्ड स्तर के कर्मचारियों तक कई पद लंबे समय से रिक्त हैं। इसका असर वन क्षेत्रों की निगरानी, पौधारोपण, पौधों के संरक्षण, अतिक्रमण की रोकथाम और प्राकृतिक वनों के पुनर्जनन जैसे कार्यों पर पड़ रहा है।
रिक्त पदों के बीच कामकाज जारी रखने के लिए प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने नौ वन क्षेत्र पदाधिकारियों और सहायक वन संरक्षकों को अतिरिक्त प्रभार सौंपा है। 18 सितंबर 2026 को जारी आदेश के तहत इन अधिकारियों को अपने मूल दायित्वों के साथ अतिरिक्त वन प्रक्षेत्र और वन प्रमंडलों की जिम्मेदारी भी संभालनी होगी। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक यह व्यवस्था रिक्त पदों पर नियमित नियुक्ति होने तक लागू रहेगी।
एक अधिकारी, कई वन प्रक्षेत्रों की जिम्मेदारी
अतिरिक्त प्रभार की सूची से पता चलता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में एक अधिकारी को कई अतिरिक्त जिम्मेदारियां दी गई हैं। नोवामुंडी के वन क्षेत्र पदाधिकारी जितेंद्र प्रसाद सिंह को सोंगर, चक्रधरपुर के साथ कोटगढ़, कुंडलीगुटू तथा शोध एवं मूल्यांकन प्रक्षेत्र का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।
कोयना के वन क्षेत्र पदाधिकारी रामनन्दन राम को बेरोन, आनंदपुर, गुदड़ी और सारंडा से जुड़े प्रक्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई है। पाकुड़ के बबलू कुमार देहरी को अमड़ापाड़ा और हिरणपुर, जबकि कुजू के देवेंद्र प्रसाद को सामाजिक वानिकी प्रक्षेत्र विष्णुगढ़ और पेटरवार का अतिरिक्त प्रभार मिला है।
सहायक वन संरक्षक सुरेश राम को दारू और हंटरगंज तथा अनिल कुमार को चास वन प्रक्षेत्र और बोकारो वन प्रमंडल का दायित्व दिया गया है। कुमारी मित्ती कुमारी को देवघर प्रादेशिक प्रक्षेत्र के साथ मधुपुर और सारठ के सामाजिक वानिकी प्रक्षेत्र की जिम्मेदारी मिली है। दुमका के वन क्षेत्र पदाधिकारी लेखर राम रवि को हिजला पूर्वी और जामताड़ा के मृत्युंजय कुमार को शिकारीपाड़ा तथा दुमका सामाजिक वानिकी प्रक्षेत्र का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।
विभागीय व्यवस्था के अनुसार संबंधित पद पर नियमित अधिकारी की नियुक्ति होने के बाद अतिरिक्त प्रभार समाप्त हो जाएगा। जरूरत के अनुसार सरकार या प्रधान मुख्य वन संरक्षक इस व्यवस्था में बदलाव भी कर सकते हैं।
रांची में ACF, RFO और फॉरेस्टर के 33 पद रिक्त
मानव संसाधन की कमी का असर राजधानी रांची में भी दिखाई दे रहा है। उपलब्ध विभागीय जानकारी के अनुसार जिले में ACF, RFO और Forester के कुल 33 पद रिक्त हैं। इनमें ACF का पद वर्ष 2023 से, Forester के पद वर्ष 2024 से और RFO के पद 2026 से खाली बताए गए हैं।
इन पदों पर नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित की गई थीं और सफल अभ्यर्थियों के साक्षात्कार की प्रक्रिया भी पूरी होने की बात सामने आई है। लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवाद, छात्रों के आंदोलन और न्यायालयी प्रक्रिया के कारण नियुक्तियां आगे नहीं बढ़ सकीं।
ACF, RFO और Forester जैसे पदों की जिम्मेदारी सिर्फ कार्यालयी कार्य तक सीमित नहीं है। फील्ड स्तर पर वन क्षेत्रों की निगरानी, पौधारोपण, पौधों की देखभाल, वन भूमि की सुरक्षा, अतिक्रमण की निगरानी और वन संरक्षण के काम में इन पदों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
फॉरेस्ट गार्ड के सहारे निगरानी
रांची के डीएफओ श्रीकांत वर्मा के अनुसार अधिकारियों और फील्ड कर्मचारियों की कमी के कारण वनरोपण और संरक्षण कार्यों में परेशानी हो रही है। फिलहाल वन क्षेत्रों की सुरक्षा और निगरानी में फॉरेस्ट गार्ड की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है।
बड़े क्षेत्र में पौधारोपण और उसके बाद नियमित देखभाल के लिए पर्याप्त फील्ड स्टाफ की जरूरत होती है। दूसरे जिलों से कर्मचारियों को बुलाकर रांची के वन क्षेत्रों की लगातार निगरानी कराना भी व्यावहारिक चुनौती है। ऐसे में विभाग को उपलब्ध मानव संसाधन के आधार पर प्राथमिकताएं तय करनी पड़ रही हैं।
करीब 20 फीसदी पौधारोपण स्थल संवेदनशील
रांची जिले में वनरोपण के लिए चिह्नित स्थलों में करीब 20 प्रतिशत साइट संवेदनशील बताई गई हैं। इन स्थानों पर पौधों को नुकसान पहुंचने की आशंका अधिक रहती है।
विभागीय जानकारी के अनुसार कुछ जगहों पर पौधों को उखाड़ने के साथ ट्री गार्ड को भी नुकसान पहुंचाया जाता है या हटा दिया जाता है। ट्री गार्ड नहीं होने पर खुले पौधों को मवेशियों से भी नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।
इसी कारण विभाग के सामने चुनौती केवल पौधे लगाने की नहीं, बल्कि उन्हें कई वर्षों तक सुरक्षित रखने की भी है। सीमित मानव संसाधन के बीच पहले से लगाए गए पौधों के संरक्षण और संवेदनशील स्थलों की निगरानी को प्राथमिकता दी जा रही है।
63 एकड़ अतिक्रमणमुक्त जमीन पर वनरोपण की तैयारी
मानव संसाधन की कमी के बावजूद रांची जिले में अतिक्रमणमुक्त कराई गई जमीन पर वन क्षेत्र विकसित करने की तैयारी है। इनमें बाढ़ू की करीब 36 एकड़ और ओरमांझी के गुडू की करीब 27 एकड़ जमीन शामिल है। कुल करीब 63 एकड़ भूमि पर वनरोपण की योजना है।
इन क्षेत्रों में पौधे लगाने के बाद उनकी सुरक्षा और नियमित देखभाल के लिए पर्याप्त फील्ड स्टाफ की आवश्यकता होगी। इसलिए वनरोपण की योजना के साथ मानव संसाधन की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण होगी।
सिर्फ पौधे लगाना नहीं, उन्हें बचाना भी चुनौती
वनरोपण का काम पौधे लगाने के साथ खत्म नहीं होता। पौधों को कई वर्षों तक सिंचाई, सुरक्षा, ट्री गार्ड और नियमित निगरानी की जरूरत होती है। रांची में संवेदनशील साइटों पर पौधों और ट्री गार्ड को नुकसान पहुंचने की शिकायतों के कारण यह चुनौती और बढ़ जाती है।
ऐसे में विभाग के सामने एक तरफ नए क्षेत्रों को हरित क्षेत्र में बदलने का लक्ष्य है, तो दूसरी तरफ पहले से लगाए गए पौधों को बचाने की जिम्मेदारी भी है। सीमित मानव संसाधन के कारण विभाग को दोनों के बीच प्राथमिकताएं तय करनी पड़ रही हैं।
अतिरिक्त प्रभार से फिलहाल चल रहा काम
वन विभाग ने तत्काल प्रशासनिक जरूरत को देखते हुए नौ अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार देकर अलग-अलग वन प्रक्षेत्रों और प्रमंडलों का काम जारी रखा है। वहीं, रांची सहित अन्य क्षेत्रों में रिक्त पदों पर नियमित नियुक्ति की प्रतीक्षा है।
अतिरिक्त प्रभार से फिलहाल कामकाज को जारी रखने की व्यवस्था जरूर हुई है, लेकिन इससे संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं। रांची में 33 महत्वपूर्ण पदों के रिक्त होने के बीच वन क्षेत्र की सुरक्षा, अतिक्रमण की निगरानी, पौधारोपण और मौजूदा पौधों के संरक्षण की चुनौती बनी हुई है। ऐसे में वन विभाग के सामने केवल नए जंगल लगाने की नहीं, बल्कि लगाए गए पौधों को सुरक्षित रखते हुए उन्हें विकसित करने की भी जिम्मेदारी है।


