अमेरिकी चुनाव से पहले ट्रम्प का बड़ा फैसला: रूस से खरीदेगा डीजल, भारत पर 100% टैरिफ की धमकी पर उठे सवाल

वॉशिंगटन: अमेरिका में ईंधन की बढ़ती कीमतों के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूसी डीजल की खरीद पर लगी रोक में अस्थायी ढील देने का फैसला किया है। इस कदम का उद्देश्य अमेरिकी बाजार में डीजल की आपूर्ति बढ़ाकर कीमतों को नियंत्रित करना बताया जा

वॉशिंगटन: अमेरिका में ईंधन की बढ़ती कीमतों के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूसी डीजल की खरीद पर लगी रोक में अस्थायी ढील देने का फैसला किया है। इस कदम का उद्देश्य अमेरिकी बाजार में डीजल की आपूर्ति बढ़ाकर कीमतों को नियंत्रित करना बताया जा रहा है। हालांकि, इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि रूस को मिलने वाली अतिरिक्त कमाई का इस्तेमाल यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध में किया जा सकता है।

यह फैसला ऐसे समय आया है, जब अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को मिडटर्म चुनाव होने हैं। ईंधन की बढ़ती कीमतें ट्रम्प प्रशासन के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में डीजल की कीमत लगभग 6.28 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है, जबकि ईरान युद्ध से पहले यह करीब 3.70 डॉलर प्रति गैलन थी।

रूस से डीजल खरीदने की अनुमति, आपूर्ति बढ़ाने की तैयारी

ट्रम्प प्रशासन ने रूसी डीजल की खरीद पर लगी रोक को 7 अप्रैल 2027 तक अस्थायी रूप से हटाने का फैसला किया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रूस अमेरिका को चरणबद्ध तरीके से बड़ी मात्रा में डीजल उपलब्ध कराएगा।

ट्रम्प के मुताबिक, शुरुआत में रूस 3 लाख टन से अधिक डीजल भेजेगा। इसके बाद नवंबर में 5 लाख टन और फिर 10 लाख टन की आपूर्ति किए जाने की योजना है। उन्होंने आगे चलकर 30 लाख टन तक डीजल मिलने की संभावना भी जताई।

व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रम्प ने कहा कि ईंधन की कीमतों को कम करना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने विशेष रूप से अमेरिकी किसानों, पशुपालकों और ट्रक चालकों को राहत देने की बात कही।

अमेरिका में डीजल की कीमतों का असर केवल परिवहन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। कृषि कार्यों, माल ढुलाई और वस्तुओं की आपूर्ति की लागत भी इससे प्रभावित होती है। ऐसे में सरकार को उम्मीद है कि ईंधन की उपलब्धता बढ़ने से घरेलू बाजार पर दबाव कम हो सकता है।

भारत पर 100% टैरिफ की धमकी के बीच फैसले पर सवाल

ट्रम्प के इस कदम को लेकर भारत और चीन के संदर्भ में भी सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में ट्रम्प ने ऐसे कानून पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले देशों, विशेष रूप से भारत और चीन, पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान हो सकता है।

ऐसे में रूस से अमेरिकी डीजल खरीदने की अनुमति देने के फैसले को लेकर आलोचक दोहरे मानदंडों का सवाल उठा सकते हैं। हालांकि, अमेरिकी डीजल खरीद पर लगी रोक में दी गई अस्थायी छूट और दूसरे देशों पर संभावित टैरिफ की कानूनी शर्तें अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए दोनों फैसलों की तुलना करते समय उनके वास्तविक प्रावधानों और लागू होने की स्थिति को समझना जरूरी है।

भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि रूस से ऊर्जा आयात और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध दोनों ही देश की आर्थिक और कूटनीतिक प्राथमिकताओं से जुड़े हैं। अमेरिकी टैरिफ नीति में बदलाव का असर भारतीय निर्यातकों और द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं पर पड़ सकता है।

जेलेंस्की ने जताई नाराजगी, बोले- रूस को मिलेगा युद्ध का पैसा

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रूस से डीजल खरीदने के अमेरिकी फैसले की आलोचना की है। उनका कहना है कि रूस को ऊर्जा कारोबार से मिलने वाली अतिरिक्त आय उसकी सैन्य क्षमता को मजबूत कर सकती है।

जेलेंस्की के मुताबिक, इस तरह के समझौते से रूस को युद्ध जारी रखने, हमलों की तीव्रता बढ़ाने और अधिक लोगों की जान लेने में मदद मिल सकती है। यूक्रेन लगातार पश्चिमी देशों से रूस पर आर्थिक दबाव बनाए रखने की अपील करता रहा है, ताकि मॉस्को को युद्ध जारी रखने के लिए मिलने वाले संसाधनों पर अंकुश लगाया जा सके।

यह बयान उस समय आया, जब यूक्रेन के वार्ताकार अमेरिका के फ्लोरिडा में अमेरिकी अधिकारियों के साथ युद्ध समाप्त करने के प्रयासों पर बातचीत कर रहे थे। ऐसे में रूसी डीजल की खरीद को लेकर अमेरिकी फैसला शांति वार्ता और रूस पर आर्थिक दबाव की रणनीति के बीच तनाव को उजागर करता है।

विशेषज्ञों को कीमतों में बड़ी गिरावट की उम्मीद नहीं

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से डीजल खरीदने की अनुमति मिलने से अमेरिकी बाजार में कीमतों पर सीमित असर पड़ सकता है। इसकी वजह वैश्विक तेल आपूर्ति, परिवहन लागत, रिफाइनिंग क्षमता और अंतरराष्ट्रीय मांग जैसे कई कारक हैं।

ऊर्जा विशेषज्ञ क्लेटन सीगल के मुताबिक, इस समझौते से ईंधन की कीमतों में बड़ा बदलाव होने की संभावना नहीं है, जबकि रूस को आर्थिक लाभ मिल सकता है।

वहीं, विशेषज्ञ माइकल लिंच ने तर्क दिया कि यदि अमेरिका रूस से डीजल खरीदता है, तो रूस के मौजूदा खरीदार दूसरे देशों से आपूर्ति तलाश सकते हैं। इससे वैश्विक बाजार में कारोबार का रास्ता बदल सकता है, लेकिन कुल कीमतों में जरूरी नहीं कि बड़ी गिरावट आए।

इसका मतलब है कि अमेरिकी उपभोक्ताओं को राहत मिलने का अंतिम परिणाम केवल रूसी डीजल की खरीद पर निर्भर नहीं करेगा। वैश्विक बाजार में उपलब्धता और अन्य आपूर्तिकर्ताओं की प्रतिक्रिया भी अहम भूमिका निभाएगी।

ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी ट्रम्प का बयान

ईंधन की कीमतों में तेजी के पीछे ईरान युद्ध और वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता भी प्रमुख कारणों में शामिल है। होर्मुज जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा व्यापार का महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से तेल और ईंधन की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका रहती है।

ट्रम्प ने दावा किया कि ईरान के साथ युद्ध समाप्त होने के बाद तेल की कीमतों में तेजी से गिरावट आ सकती है। उन्होंने तेल रिफाइनरियों और खुदरा विक्रेताओं से पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम करने की अपील भी की।

उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही और वहां अमेरिकी नियंत्रण को लेकर भी बयान दिया। हालांकि, इन दावों और आपूर्ति संबंधी आंकड़ों का स्वतंत्र सत्यापन जरूरी है।

क्रेमलिन के मुताबिक, ट्रम्प ने ईरान युद्ध का समाधान निकालने के प्रयासों में रूस की भूमिका का स्वागत किया है। इससे संकेत मिलता है कि ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों से जुड़े मुद्दों पर अमेरिका और रूस के बीच संपर्क बना हुआ है।

आगे क्या होगा?

रूसी डीजल खरीदने की अनुमति से अमेरिका को अल्पकाल में अतिरिक्त आपूर्ति मिल सकती है, लेकिन इससे कीमतों में कितनी राहत मिलेगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। दूसरी ओर, रूस को ऊर्जा कारोबार से मिलने वाला संभावित आर्थिक लाभ यूक्रेन युद्ध को लेकर पश्चिमी देशों की रणनीति पर नए सवाल खड़े कर सकता है।

ट्रम्प प्रशासन के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक तरफ अमेरिकी उपभोक्ताओं को महंगे ईंधन से राहत देना और दूसरी तरफ रूस के खिलाफ अपनी घोषित आर्थिक नीति को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब देना। आगामी मिडटर्म चुनावों से पहले यह फैसला अमेरिकी घरेलू राजनीति, वैश्विक ऊर्जा बाजार और रूस-यूक्रेन संघर्ष के लिहाज से महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

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